Special Story: Delhi की केजरीवाल सरकार, काम की सरकार या प्रचार-प्रसार की सरकार?

2 करोड़ की आबादी वाले प्रदेश में सरकार ने 500 करोड़ से ज्यादा की रकम केवल अपने विज्ञापन में खर्च कर दी है।

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दिल्ली की केजरीवाल सरकार को लेकर अक्सर लोगों के मुंह से सुनने को मिलता है कि सरकार काम से ज्यादा विज्ञापन पर खर्च करती है। अक्सर आप जब दिल्ली की सड़कों पर घुमेंगे तो दिल्ली सरकार के बड़े बड़े बैनर पोस्टर आपको दिख जाएंगे। यहां तक कि अभी कोरोना वैक्सीन के कई विज्ञापन आपको सड़क पर चलते दिख जाएंगे जबकि कोरोना वैक्सीन दिल्ली की जनता को केन्द्र सरकार की तरफ से लगाए जा रहे हैं लेकिन इस विज्ञापन में देश के प्रधानमंत्री की फोटो नहीं बल्कि दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल की फोटो दिखेगी। टीकाकरण केन्द्र पर जाए तो वहां मुख्यमंत्री केजरीवाल द्वारा दिल्ली की जनता को मुफ्त वैक्सीन लगवाने के लिए धन्यवाद देते पोस्टर आपको दिख जाएंगे और यही सब कारण होता है कि दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल अक्सर विवादों में घिरे ही रहते हैं और विज्ञापन के लिए बेवजह बजट खर्च करने के सवाल तो कई बार खड़े होते हैं।

दिल्ली में लगातार 4 बार बनी आम आदमी पार्टी की सरकार

दिल्ली में आम आदमी पार्टी की सरकार लगातार चार बार बनी है। पहली सरकार का गठन 28 दिसंबर 2013 को हुआ था जो मात्र 49 दिन के लिए थी। इसके बाद 15 फरवरी 2014 को कांग्रेस के समर्थन से दूसरी बार अरविंद केजरीवाल की सरकार बनी जो 369 दिनों चल पाई। इसके बाद अरविंद केजरीवाल ने इस्तीफा दे दिया था। तीसरी सरकार का गठन 14 फरवरी 2015 में किया गया इस बार आप बड़े बहुमत के साथ दिल्ली की सत्ता में आई और फिर चौथी बार 2020 में हुए दिल्ली विधानसभा चुनाव में एक बार फिर आम आदमी पार्टी का वर्चस्व और भारी बहुमत के साथ आम आदमी पार्टी सत्ता में आई। दिल्ली की जनता को आम आदमी पार्टी का विकास मॉडल पसंद आने लगा था और साथ ही फ्री की स्कीम में भी जनता के मन को मोह लिया है। लेकिन केजरीवाल की अगुवाई में आम आदमी पार्टी की सरकार ने जनता के पैसों को अपनी सरकार के काम के प्रचार – प्रसार के लिए खर्च किए। अब प्रचार प्रसार में जो पैसे खर्च किये गए वो चौंकाने वाला है।

विज्ञापन पर खर्च का लेखा-जोखा

2012-13 में आम आदमी पार्टी सरकार ने ₹10 करोड़ सरकार के विज्ञापन पर खर्च किये और फिर 2013-14 में 11 करोड़ खर्च किये। इसके बाद 2014-15 में चुनाव से ठीक पहले 7 करोड़ रुपए विज्ञापन पर खर्च किए गये और 2015-16 में सरकार के गठन के बाद केजरीवाल सरकार की तरफ से प्रचार प्रसार के लिए 62 करोड रुपए खर्च किए गए। साल 2017 में अरविंद केजरीवाल की सरकार ने विज्ञापन पर 66.80 करोड़ रुपए खर्च किए, तो वहीं 2017-18 में यह आंकड़ा लगभग 2 गुना हो चुका था इस वर्ष में केजरीवाल सरकार ने विज्ञापन पर 120 करोड रुपए खर्च कर दिए थे। लेकिन इसके बाद 2018-19 में इस आंकड़ों में थोड़ी कमी आई और सरकार विज्ञापन पर सिर्फ़ 46.90 करोड़ रुपए खर्च किऐ। ऐसे में 2019 और 20 के लिए विज्ञापन पर अरविंद केजरीवाल सरकार ने कई गुना ज्यादा रकम खर्च कर डाली। इस वित्त वर्ष में केजरीवाल सरकार के द्वारा विज्ञापन पर 201.20 करोड रुपए खर्च कर दिए। वही साल 2020 के मार्च महीने में कोरोनावायरस ने दस्तक दी तब भी अरविंद केजरीवाल की सरकार विज्ञापन पर रोक नहीं लगा पाई और विज्ञापरन पर ताबड़तोड़ खर्च किये। हालांकि अभी तक 2020-21 के आंकड़े सही तरीके से मौजूद नहीं है।

लेकिन जिस तरह से कोरोना काल में केजरीवाल सरकार ने विज्ञापन के जरिए अपनी उपलब्धियों को जाहिर करने की कोशिश की है। उससे सिर्फ यही पता चलता है कि यह आंकड़ा साल 2019-20 के मुताबिक कई गुना और बढ़ गया है हालांकि 2020 – 21 के लिए जनवरी तक का आंकड़ा 177 करोड़ बताया जा रहा है। ऐसे में अरविंद केजरीवाल सरकार के इस 7 साल के कार्यकाल को देखें तो पता चलेगा कि विकास से ज्यादा फोकस विज्ञापन पर रहा है। अगर देखा जाए तो 2 करोड़ की आबादी वाले प्रदेश में सरकार ने 500 करोड़ से ज्यादा की रकम केवल अपने विज्ञापन में खर्च कर दी है। सरकार ने विज्ञापन पर जितना पैसा खर्च किया उन पैसों से जनता को विकास का एक और मानक तैयार करके दिया जा सकता था। यही वजह रही कि प्रदेश की जनता के टैक्स के पैसों को इतनी बड़ी मात्रा में सरकार के कामकाज के प्रचार प्रसार के लिए खर्च कर दिया गया।