SPECIAL: राजनीतिक उदासीनता का शिकार हो रहा है निर्भया फंड! पैसा होते हुए भी क्यों नहीं तैयार होता सुरक्षित माहौल

सरकार ने इस ओर कदम उठाये और इसको लेकर एक कठोर कानून बनाया। ऐसा फिर कभी ना हो उसको रोकने के लिए सरकार ने एक निर्भया फंड बनाया। सरकार द्वारा बनाये गए इस फंड का मकसद था कि ऐसी दुर्घटनाओं को रोकने के लिए पहले से ही जो कदम उठाए जाने चाहिए वह उठाए जा सके।

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हैदराबाद में महिला डॉक्टर के साथ गैंगरेप और फिर हत्या मामले ने एकबार फिर देश में महिला सुरक्षा को लेकर केन्द्र और राज्य सरकार के दावों की पोल खोल दी है। इस घटना ने एकबार फिर ये सोचने पर मजबूर कर दिया है कि जिस देश के प्रधानमंत्री नारा देते हैं “बेटी बचाओं, बेटी पढ़ाओ”, तो क्या उस देश की बेटी आज अपने ही देश में, अपने राज्य या अपने शहर में सुरक्षित है? मेरे लिये तो जवाब है – ना। अगर वो सुरक्षित रहती तो एक और बेटी को इंसाफ दिलाने के लिए लोग सड़कों पर नहीं होते। 2012 में दिल्ली की घटना को आप अबतक शायद भूले नहीं होंगे। जब निर्भया कांड हुआ तो देशभर में लोग मोमबत्ती लेकर सड़कों पर उतरे इस उम्मीद के साथ कि अब भविष्य में ऐसी घटना दोबारा ना हो। गुस्सा सरकार के खिलाफ था, पुलिस प्रशासन के खिलाफ था और सिस्टम के खिलाफ था।

सरकार ने इस ओर कदम उठाये और इसको लेकर एक कठोर कानून बनाया। ऐसा फिर कभी ना हो उसको रोकने के लिए सरकार ने एक निर्भया फंड बनाया। सरकार द्वारा बनाये गए इस फंड का मकसद था कि ऐसी दुर्घटनाओं को रोकने के लिए पहले से ही जो कदम उठाए जाने चाहिए वह उठाए जा सके। इसके लिए हर साल राज्यों को केंद्र की तरफ से करोड़ों रुपए भी दिया जाने लगा। लेकिन सबसे बड़ी विडंबना ये है कि राज्य सरकारें इस पैसे को खर्च तक नहीं कर पा रही हैं। इस बात का पता चला है लोकसभा में केंद्रीय महिला एवं विकास मंत्रालय की तरफ से दिए गए जवाब में। इस जवाब में जानकारी दी गई कि केंद्र सरकार की तरफ से हर साल राज्यों को करोड़ों रुपए निर्भया फंड के नाम पर दिया जाता रहा है लेकिन अधिकतर राज्य ऐसे हैं जिन्होंने उस पैसे का अब तक सही इस्तेमाल नहीं किया औऱ हैरान करने वाली बात तो ये है कि कई राज्यों ने इस फंड में से एक रुपया तक खर्च नहीं किया।

जिन राज्यों ने निर्भया फंड में से एक रुपया भी खर्च नहीं किया है उसमें महाराष्ट्र, मणिपुर, मेघालय, सिक्किम, त्रिपुरा, और दादर नागर हवेली भी शामिल हैं। वहीं देश के बाकी राज्यों में भी निर्भया फंड को लेकर स्थिति बहुत ही चिंताजनक बनी हुई है। लोकसभा में जो आंकड़े पेश किये गये, इससे ये पता चलता है कि देश के बाकी राज्य भी निर्भया फंड को लेकर कितने गंभीर हैं।

लोकसभा में सामने आये अनुमानित आंकड़े के मुताबिक-

  1. आंध्र प्रदेश – 20 करोड़ में से 8 करोड़
  2. अरुणाचल प्रदेश – 8 करोड़ में से 2 करोड़,
  3. असम –  20 करोड़ों में से 3 करोड़,
  4. बिहार – 22 करोड़ में से 7 करोड़,
  5. छत्तीसगढ़ – 16 करोड़ में से 7.5 करोड़,
  6. गोवा – 7 करोड़ में से 2 करोड़,
  7. गुजरात – 70 करोड़ में से 1 करोड़,
  8. हरियाणा – 16 करोड़ में से 6 करोड़,
  9. हिमाचल प्रदेश – 11 करोड में से 3 करोड़,
  10. जम्मू कश्मीर – 12 करोड़ में से 3 करोड़,
  11. झारखंड  – 15 करोड़ में 4 करोड़,
  12. कर्नाटक – 191 करोड़ों में से 13 करोड़,
  13. केरल – 19 करोड़ में से 4 करोड़,
  14. मध्य प्रदेश – 43 करोड़ों में से 6 करोड़,
  15. महाराष्ट्र – 149 करोड़ों में से एक पैसा भी नहीं,
  16. मणिपुर – 8 करोड़ में से एक पैसा भी नहीं,
  17. मेघालय – 6 करोड़ में से एक पैसा भी नहीं,
  18. मिजोरम – 8 करोड़ में से 5 करोड़,
  19. नागालैंड – 6 करोड़ में से 3 करोड़,
  20. ओडिशा – 22 करोड़ में से 58 लाख,
  21. पंजाब – 20 करोड़ों में से 3 करोड़,
  22. राजस्थान – 33 करोड़ में से 10 करोड़,
  23. सिक्किम – 6 करोड़ में से एक पैसा भी नहीं,
  24. तेलंगाना – 10 करोड़ में से 4 करोड़,
  25. तमिलनाडु – 19 करोड़ में से 6 करोड़,
  26. त्रिपुरा – 7 करोड़ में से एक पैसा भी नहीं,
  27. उत्तर प्रदेश – 119 करोड़ में से करीबन 4 करोड़,
  28. उत्तराखंड – 9 करोड़ में से 7 करोड़,
  29. पश्चिम बंगाल – 75 करोड़ में से 4 करोड़,
  30. अंडमान निकोबार – 6 करोड़ में से 1.5 करोड़,
  31. चंडीगढ़ – 7 करोड़ में से 2.6 करोड़,
  32. दादरा नगर हवेली – 4 करोड़ में से 1.5 करोड़,
  33. दमन दीव – 4 करोड़ में से एक पैसा भी नहीं,
  34. दिल्ली – 390 करोड़ में से 19 करोड़,
  35. लक्षदीप – 6 करोड़ में से 76 लाख,
  36. पुडुचेरी – 5 करोड़ में से 1 करोड़ खर्च किया है.

इन आंकड़ों से ये पता चलता है कि भले ही सरकारें महिला सुरक्षा को लेकर दावे कितने ही क्यों ना करें, लेकिन कोई भी राज्य सरकार इसको लेकर गंभीर नहीं है। निर्भया फंड को लेकर सामने आया यह आंकड़ा एक राजनीतिक उदासीनता को भी दर्शाता है। 2012 के निर्भया कांड से लेकर 2019 के हैदराबाद की महिला डॉक्टर के साथ गैंगरेप भी हत्या मामले तक सभी राजनीतिक दलों ने राजनीति खूब की, संवेदनाएं जताई, कड़े कानून की बात कही और दोषियों को जल्द से जल्द और कड़ी से कड़ी सजा की वकालत की, लेकिन जब खुद ऐसी घटनाओं को रोकने के लिए प्रयास करने की बारी आई तो सब उसमें विफल होते ही नजर आए।

यहां मेरा सवाल यही है कि क्या सिर्फ कड़े कानून बना देने मात्र से ही सारी समस्या खत्म हो जाएगी?  क्या राज्य सरकारें निर्भया फंड से पैसे खर्च कर देश की बेटियों के लिए सुरक्षित माहौल तैय़ार नहीं कर सकते? मेरा एक सवाल ये भी है कि इन नेताओं के बच्चे सरकार द्वारा गये सुरक्षा में खुली सड़कों पर घुम सकती है तो क्या सरकार आम लड़कियों के लिए एक ऐसा माहौल तैयार नहीं कर सकती, जिससे उनको भी इस बात की तसल्ली हो कि वो सुरक्षित हैं? क्या बार बार निर्भया जैसी घटना के बाद ही सरकार जागेगी?

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