West Bengal Assembly Election के दूसरे चरण में पड़े 80% वोट, क्या खिसक रही है ममता दीदी की गद्दी?

ममता बनर्जी ने नंदीग्राम की गलियों में घूम-घूमकर प्रचार किया और बीजेपी की तरफ से खुद पर लगाए जा रहे 'मुस्लिम तुष्टीकरण' के आरोपों को गलत साबित करने के लिए मंदिर-मंदिर दर्शन किए। चंडीपाठ किया। प्रचार खत्म होते-होते उन्हें 'गोत्र' कार्ड भी खेलना पड़ा।

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नई दिल्ली: पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव के दूसरे चरण के लिए भी पहले चरण की तरह ही बंपर वोटिंग हुई। गुरुवार को 30 सीटों के लिए हुए मतदान में हल्की हिंसा की घटनाएं हुई लेकिन बावजूद इसके मतदान प्रतिशत लगभग 80 फीसदी रहा। चुनाव आयोग के मुताबिक 80 प्रतिशत से ज्यादा मतदाताओं ने अपने मताधिकार का प्रयोग किया। गुरुवार को हुए मतदान में नंदीग्राम सीट के लिए भी वोटिंग हुई जो एक हाईप्रोफाइल सीट मानी जा रही है। यही वो विधानसभा सीट है जहां से ममता बनर्जी अचानक से बंगाल की राजनीतिक फलक पर अचानक से छा गई थी, लेकिन आज एक जमाने में उनके ही रहे सेनापति शुभेंदु अधिकारी से कड़ी टक्कर मिल रही है। राजनीति के जानकारों की माने तो इसबार दोनों चरणों में हुई बंपर वोटिंग ममता दीदी के लिए शुभ संकेत नहीं है।

आम तौर पर राजनीति में ये बात मानी जाती है कि अगर बंपर वोटिंग होती है तो वो वोटिंग सत्ता के खिलाफ माना जाता है। वोटिंग अगर पहले से ज्यादा होती है तो इसे इस रुप में देखा जाता है कि जनता सरकार से नाराज़ है और वो परिवर्तन चाहती है और तभी इस परिवर्तन के लिए ज्यादा से ज्यादा संख्या में आकर अपने मताधिकार का प्रयोग करती है। लेकिन हरबार ऐसा हो ये भी जरुरी नहीं है। लेकिन पश्चिम बंगाल के विधानसभा चुनाव में जिस तरह से दोनों चरणों में बंपर वोटिंग देखी गई इससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि हो ना हो इसबार हवा का रुख भारतीय जनता पार्टी की तरफ है। कहीं ना कही इसका अंदाजा इसबात से भी लगता है कि अभी कुछ दिन पहले ही ममता बनर्जी का एक ऑडियो वायरल हुई है जिसमें वो नंदीग्राम सीट पर उनको जीत दिलाने में मदद करने के लिए एक बीजेपी कार्यकर्ता को फोन किया था।

हालांकि जो पश्चिम बंगाल की राजनीतिक को बहुत करीब से जानते हैं उनका ये कहना है कि अगर पश्चिम बंगाल में 80 फीसदी वोटिंग होती है तो ये कोई बड़ी बात नहीं हैं लेकिन यहां 2 से 4 प्रतिशत का उतार-चढ़ाव पूरे के पूरे समीकरण को बदल देता है। इसकी जीता जागता उदाहरण है 2011 का विधानसभा चुनाव। 2011 के विधानसभा चुनाव में भी जबरदस्त वोटिंग हुई थी। इस चुनाव में 84.7 फीसदी वोटरों ने अपने मताधिकार का इस्तेमाल किया था लेकिन जब चुनाव के नतीजे आये तो वो संभावनाओं से बिल्कुल अलग था। चुनाव का रुख और एक्जिट पोल लेफ्ट की तरफ था लेकिन जब नतीजा आया तो ममता दीदी की टीएमसी ने लेफ्ट बने बनाये किले को ध्वस्त कर दिया। ऐसा ध्वस्त किया कि लेफ्ट आजतक कमबैक नहीं कर पाई, जबकि पूरे देश हर किसी को उम्मीद थी कि ममता लेफ्ट का किला ध्वस्त करने में कामयाब नहीं हो पाएगी।

वही बात करें 2016 के बंगाल विधानसभा चुनाव की तो 2011 की तुलना में इस साल कम वोटिंग हुई। इस साल सिर्फ 81.9 फीसदी ही वोटिंग हुई। ममता बनर्जी एकबार फिर प्रदेश की मुखिया बनीं। वहीं 2019 के लोकसभा चुनाव में भी बंगाल में वोटिंग प्रतिशत 81.7 फीसदी रहा। लेकिन 2021 के विधानसभा चुनाव में जो वोट प्रतिशत है वो करीब करीब 2011 के वोट प्रतिशत के बराबर ही है। तो इस हिसाब से देखा जाए तो 2021 के विधानसभा चुनाव के दोनों चरणों में हो रही बंपर वोटिंग टीएमसी और ममता दीदी के लिए शुभ संकेत नहीं हैं। 2011 में जो वोटिंग प्रतिशत था वो सत्ता परिवर्तन के लिए था तो इसबार भी जो बंपर वोटिंग हो रही है उससे भी ये अंदाजा लगाया जा रहा है कि पश्चिम बंगाल की जनता सत्ता परिवर्तन के लिए ही शायद वोट कर रही है। मतलब साफ है कि 2011 के बाद 2021 में भी खेला होवे…पोरिवोर्तन होवे…

हालांकि पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव के लिए अभी 6 चरणों की वोटिंग बाकी है, लिहाजा अभी से कोई भी अंदाजा लगाना बहुत ही जल्दबाजी होगी। लेकिन हां ये चुनाव 2016 की तरह का चुनाव नहीं है। ममता बनर्जी ने अपनी भवानीपुर सीट छोड़ नंदीग्राम सीट से चुनाव लड़ने का फैसला किया लेकिन वहां बीजेपी की तरफ से शुभेंदु अधिकार उनको टक्कर देने पहुंच गए। मतदाताओं की संवेदना भी उसके साथ जा सकती है जो वहां को लोकल है ना कि उसके लिए जो वहां बाहर से आकर चुनाव लड़ रहा है। मतलब साफ है कि फायदा शुभेंदु अधिकारी को मिल सकता है। शायद ममता बनर्जी को भी इसबात का अंदाजा है कि वो नंदीग्राम से चुनाव नहीं जीत पाएंगी, तभी तो वो पिछले 5 दिनों से लगातार नंदीग्राम की गली गली जा कर चुनाव प्रचार कर रही थीं, कहीं बाहर जाकर उन्होंने चुनाव प्रचार करने नहीं गई।

ममता बनर्जी ने नंदीग्राम की गलियों में घूम-घूमकर प्रचार किया और बीजेपी की तरफ से खुद पर लगाए जा रहे ‘मुस्लिम तुष्टीकरण’ के आरोपों को गलत साबित करने के लिए मंदिर-मंदिर दर्शन किए। चंडीपाठ किया। प्रचार खत्म होते-होते उन्हें ‘गोत्र’ कार्ड भी खेलना पड़ा। सारी कवायद इसलिए कि वोटों का सांप्रदायिक आधार पर ध्रुवीकरण न हो जाए। इसके अलावा, ममता बनर्जी सुवेंदु अधिकारी को गद्दार बताती रहीं और नंदीग्राम में उम्मीद के मुताबिक विकास नहीं होने का ठीकरा उन पर फोड़ती रहीं। लेकिन गुरुवार को जब वोटिंग चल रही थी तब दोपहर तक वह अपने घर में रहीं। फिर अचानक एक बूथ पर पहुंचकर आरोप लगाने लगीं कि बाहरी लोग टीएमसी के वोटरों को वोट देने से रोक रहे हैं। वहीं से कभी गवर्नर को फोन घुमाया तो कभी चुनाव अधिकारियों को। वहीं थोड़ी दूर पर बीजेपी और टीएमसी के समर्थक आपस में भिड़ गए। तनाव का माहौल था। इन सबके बीच ममता बनर्जी के चेहरे पर भी तनाव साफ देखा जा सकता था। इन सब चीजों से यह तो अब साफ हो चुका हैकि इस बार ममता के लिए डगर बहुत आसान नहीं है। अब जो होगा उसका पता 2 मई को लग ही जाएगा।