Bihar Special: “इंजीनियर से सुशासन बाबू” तक का ऐसा रहा नीतीश कुमार का सफर…

मुद्दा चाहे शिक्षा का हो या फिर बेरोजगारी का या फिर सड़क का हो। नीतीश कुमार ने सबसे पहले इन्हीं तीनों मुद्दे पर काम किया और फिर आगे चलकर विकास पुरुष कहलाए। नीतीश के काम का लोहा सिर्फ बिहार ही नहीं बल्कि दूसरे राज्यों ने भी लिया।

0
245
File Photo

बिहार की सत्ता पर एकबार नीतीश कुमार काबिज हो चुके हैं और इसके साथ ही नीतीश कुमार ने एक रिकॉर्ड भी बना लिया है। दरअसल नीतीश कुमार बिहार के ऐसे पहले मुख्यमंत्री हैं जो सात बार मुख्यमंत्री पद की शपथ ले चुके हैं और साथ ही साथ दूसरा रिकॉर्ड ये भी है कि नीतीश कुमार बिहार के पहले ऐसे मुख्यमंत्री हैं जो लगातार चार बार प्रदेश की सत्ता पर काबिज हुए हैं। नीतीश कुमार जब पहली बार मुख्यमंत्री बने थे तो उस वक्त उनकी सरकार मात्र 7 दिनों तक चली थी, लेकिन फिर भी नीतीश कुमार ऐसे मुख्यमंत्री के तौर पर उभरे हैं जो पिछले डेढ़ दशक से बिहार की सत्ता को संभाले हुए हैं। देशभर में पिछड़े राज्यों की गिनती में आने वाला बिहार में नीतीश कुमार के नेतृत्व में विकास की ऐसी बयार बही कि प्रदेश में उन्हें सुशासन बाबू का दर्जा दे दिया गया।

इंजीनियरिंग की पढ़ाई कर चुके नीतीश कुमार को राजनीति के माहिर खिलाड़ियों में से एक माना जाता है। सही समय पर दोस्त को दुश्मन और दुश्मन को दोस्त बनाना भी नीतीश बाबू बखूबी जानते हैं। तीन साल शासन के बाद वह बिहार के सबसे लंबे समय तक मुख्यमंत्री रहने का रिकॉर्ड अपने नाम कर लिया। भले ही इस बार चुनाव में जेडीयू का प्रदर्शन पहले जैसा नहीं रहा और उसे पिछली बार 2015 विधानसभा चुनाव में मिली 71 सीटों के मुकाबले इस बार मात्र 43 सीटें मिलीं हैं, लेकिन सियासी वक्त की नजाकत को समझने वाले नीतीश कुमार इस बार भी मुख्यमंत्री बने रहने में कामयाब रहे। मंडल की राजनीति से नेता बनकर उभरे नीतीश कुमार को बिहार को अच्छा शासन मुहैया कराने का श्रेय दिया जाता है, लेकिन उनके विरोधी उन पर अवसरवादी होने का आरोप लगाते रहे हैं।

नीतीश कुमार को ऐसे राजनेता के रुप में जाना जाता है जो राजीनिक मौसम की सरगर्मी को मौका रहते भांप जाते हैं और साथ ही साथ उसके हिसाब से ही वो कदम उठाते रहे हैं। ये बात कहने में कोई दो राय नहीं कि भले ही इसे राजनीतिक अवसरवादिता कहा जाए या उनकी बुद्धिमत्ता, राजनीतिक शतरंज की बिसात पर नीतीश की चालों ने वर्षों से सत्ता पर उनका दबदबा बनाए रखा है। कोई भी राजनीतिक चाल चलने से पहले अपने सभी विकल्पों पर अच्छी तरह सोच-विचार करने के लिए जाने-जाने वाले कुमार कभी लहरों के विरुद्ध जाने से संकोच नहीं करते। जेपी आंदोलन में सक्रिय भूमिका निभाने वाले युवा नीतीश ने राज्य विद्युत विभाग में नौकरी का प्रस्ताव ठुकरा दिया और राजनीति में जुआ खेलने का फैसला किया।

जयप्रकाश नारायण के नेतृत्व वाले आंदोलन में अपने साथ राजनीति में कदम रखने वाले लालू प्रसाद और राम विलास पासवान के विपरीत कुमार को लंबे समय तक चुनाव में जीत नहीं मिली। उन्हें 1985 के विधानसभा चुनाव में लोक दल के उम्मीदवार के तौर पर हरनौत विधानसभा सीट से पहली बार सफलता मिली, हालांकि उस चुनाव में कांग्रेस ने भारी बहुमत हासिल किया था। यह चुनाव इंदिरा गांधी की हत्या के कुछ महीने बाद हुआ था। पहली चुनावी जीत के चार साल बाद वह बाढ़ लोकसभा क्षेत्र से निर्वाचित हुए। यह वही दौर था जब सारण से लोकसभा सदस्य रहे लालू प्रसाद पहली बार बिहार के मुख्यमंत्री बने थे। उस वक्त जनता दल के भीतर मुख्यमंत्री के लिए नीतीश ने लालू का समर्थन किया था। इसके बाद कुछ वर्षों में लालू प्रसाद बिहार की राजनीति में सबसे ताकतवर नेता के तौर पर उभरे, हालांकि बाद में चारा घोटाले में नाम आने और फिर पत्नी राबड़ी देवी को मुख्यमंत्री बनाने के बाद वह विवादों से घिरते चले गए।

नीतीश ने भी 1990 के दशक के मध्य में ही जनता दल और लालू से अपनी राह अलग कर ली तथा बड़े समाजवादी नेता जॉर्ज फर्नांडिस के साथ समता पार्टी का गठन किया। उनकी समता पार्टी ने भाजपा के साथ गठबंधन किया और नीतीश ने एक बेहतरीन सांसद के रूप में अपनी पहचान बनाई तथा अटल बिहारी वाजपेयी के मंत्रिमंडल में बेहद ही काबिल मंत्री के तौर पर छाप छोड़ी। बाद में लालू प्रसाद और शरद यादव के बीच विवाद हुआ। यादव ने अपनी अलग राह पकड़ ली। इसके बाद समता पार्टी का जनता दल के शरद यादव के धड़े में विलय हुआ जिसके बाद जनता दल (यूनाइटेड) वजूद में आया। जद(यू) का भाजपा का गठबंधन जारी रहा। साल 2005 की शुरुआत में हुए विधानसभा चुनाव में भाजपा-जद (यू) के गठबंधन वाला राजग कुछ सीटों के अंतर से बहुमत के आंकड़े दूर रह गया जिसके बाद राज्यपाल बूटा सिंह ने विधानसभा भंग करने की सिफारिश की जिसको लेकर विवाद भी हुआ। उस वक्त केंद्र में संप्रग की सरकार थी।

इसके कुछ महीने बाद हुए विधानसभा चुनाव में नीतीश कुमार के नेतृत्व में राजग की बिहार में पूर्ण बहुमत की सरकार बनी और यहीं से बिहार की राजनीति में तथाकथित ‘लालू युग के पटाक्षेप की शुरुआत हुई। सत्ता में आने के बाद नीतीश ने नए सामाजिक समीकरण बनाने हुए पिछड़े वर्ग में अति पिछड़ा और दलित में महादिलत के कोटे की व्यवस्था की। लालू राज के बाद जिस वक्त नीतीश कुमार ने बिहार की सत्ता संभाली थी तो उस वक्त उनके सामने तीन बड़े मुद्दे थे। मुद्दा चाहे शिक्षा का हो या फिर बेरोजगारी का या फिर सड़क का हो। नीतीश कुमार ने सबसे पहले इन्हीं तीनों मुद्दे पर काम किया और फिर आगे चलकर विकास पुरुष कहलाए। नीतीश के काम का लोहा सिर्फ बिहार ही नहीं बल्कि दूसरे राज्यों ने भी लिया।

नीतीश कुमार ने स्कूली बच्चियों के लिए मुफ्त साइकिल और यूनीफार्म जैसे कदम उठाए और 2010 के चुनाव में उनकी अगुवाई में भाजपा-जद(यू) गठबंधन को एकतरफा जीत मिली। इसके बाद भाजपा में ‘अटल-आडवाणी युग खत्म हुआ और नरेन्द्र मोदी राष्ट्रीय राजनीति के क्षितिज पर आए तो नीतीश ने 2013 में भाजपा से वर्षों पुराना रिश्ता तोड़ लिया। 2014 के लोकसभा चुनाव में जद(यू) को बड़ी हार का सामना करना पड़ा और भाजपा ने बिहार से बड़ी जीत हासिल की। नीतीश ने नैतिक जिम्मेदारी लेते हुए मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा दे दिया और जीतन राम मांझी को मुख्यमंत्री बनाया। करीब एक साल के भीतर ही मांझी का बागी रुख देख नीतीश ने फिर से मुख्यमंत्री की कमान संभाली। 2015 के चुनाव में वह राजद और कांग्रेस के साथ मिलकर चुनाव लड़े और इस महागठबंधन को बड़ी जीत हासिल हुई।

नीतीश ने अपनी सरकार में उप मुख्यमंत्री एवं राजद नेता तेजस्वी यादव के खिलाफ भ्रष्टाचार के आरोप लगने के बाद मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा दे दिया। हालांकि कुछ घंटों के भीतर ही भाजपा के समर्थन से एक बार फिर बिहार के मुख्यमंत्री बने। उन्हें नरेंद्र मोदी के खिलाफ एक चुनौती के तौर पर देखने वाले लोगों ने नीतीश के इस कदम को जनादेश के साथ विश्वासघात करार दिया। हालांकि, वह बार-बार यही कहते रहे कि मैं भ्रष्टाचार से समझौता कभी नहीं करूंगा। अगर आपको थोड़ा पीछे की बात कर लें तो इंजीनियरिंग की पढ़ाई के दौरान ही वह राजनीति में अपनी पैठ बना चुके थे। संसदीय राजनीति की शुरुआत उन्होंने लालू प्रसाद के साथ रहकर शुरू की। मगर वर्ष 2009 के चुनाव में वह भाजपा के साथ हो गए।  इस बार फिर भाजपा का साथ उनको मिला है। बीच में 2014 में उनकी अपनी पार्टी जदयू अकेले चुनाव लड़ी। तब मात्र दो सीटों पर उनके उम्मीदवार जीत सके थे। इसके पहले विधानसभा का चुनाव वह दो बार भाजपा के साथ रहकर जीते और राज्य में सरकार बनाई। तीसरी बार उन्होंने विधानसभा चुनाव में लालू प्रसाद की पार्टी का साथ ले लिया, लेकिन लगभग डेढ़ साल के बाद ही उनका मोह भंग हो गया।