BirthDay Special: सत्यजीत रे को मुंबई ले जाने के लिए क्यों बेताब थे राज कपूर, मुंहमांगी रकम की थी ऑफर…

सत्यजीत रे का जन्म 2 मई 1921 को कोलकाता में हुआ था। उनकी शिक्षा प्रेसिडेंसी कॉलेज और विश्व भारती विश्वविद्यालय में हुई। करियर की शुरुआत उन्होंने बतौर पेंटर की।

0
215

भारतीय फिल्म उद्योग में कई दिग्गज हुए, लेकिन ये हमारे लिए गर्व की बात है कि हमारे यहां सत्यजीत रे जैसे डायरेक्टर भी हुए हैं। उन्होंने न सिर्फ देश बल्कि विदेश तक के सिनेमा पर अपनी छाप छोड़ी है। सत्यजीत रे का फिल्मों को लेकर जुनून इस कदर था कि उनकी बताई चीजों को हॉलीवुड डायरेक्टर भी फॉलो करते थे। सत्यजीत रे को आज दुनिया को अलविदा कहे करीब 30 बरस से ज्यादा वक्त बीत गए, लेकिन उनकी फिल्में, उनका निर्देशन आज भी याद किया जाता है। आज उन्ही महान डायरेक्टर का जन्मदिन है। इस मौके पर जानते हैं उनसे जुड़ी कई बातें। सत्यजीत रे का जन्म 2 मई 1921 को कोलकाता में हुआ था। उनकी शिक्षा प्रेसिडेंसी कॉलेज और विश्व भारती विश्वविद्यालय में हुई। करियर की शुरुआत उन्होंने बतौर पेंटर की। बाद में फ्रांसिसी फिल्म निर्देशक जॉ रन्वार से मिलने और लंदन में इतालवी फिल्म लाद्री दी बिसिक्लेत फिल्म बाइसिकल चोर देखने के बाद फिल्म निर्देशन की ओर उनका रुझान हुआ। 

सत्यजीत राय निर्देशन में आने के बाद उन्होंने पीछ मुड़कर नहीं देखा और भारत के सर्वोच्च फिल्म निर्देशक के रूप में सामने आए। सत्यजीत रे की पहली फिल्म ‘पथेर पांचाली’ थी। यह फिल्म 1955 में आई थी। उनकी पहली फिल्म पाथेर पांचाली ने 11 इंटरनेशनल अवार्ड जीते। 11 इंटरनेशनल अवार्ड जिनमें वैंकूवर में बेस्ट फिल्म, रोम में वेटिकन अवॉर्ड, टोक्यो में बेस्ट फॉरेन फिल्म अवॉर्ड और कान फिल्म फेस्टिवल का बेस्ट ह्यूमन डॉक्यूमेंट अवॉर्ड भी शामिल है। पथेर पांचाली के बाद तो उन्होंने फिल्मों की झड़ी लगा दी। सत्यजीत रे अपनी फिल्में में इंसानी रिश्ते, भावनाएं, संघर्ष, खुशियां, प्यार, मुस्कुराहटें, विसंगतियां, इन सब को इतनी बारीकी के साथ छूते थे कि लगता था हम फिल्म नहीं देख रहे, बल्कि पड़ोस के घर की कहानी सुन रहे हैं। यही कारण है कि सत्यजीत रे की फिल्में हिंदुस्तान की जमीन से उठकर पूरी दुनिया और पूरी मानवता के फलक से जुड़ जाती हैं।

सत्यजीत रे बहुमुखी प्रतिभावाले फिल्मकार थे और वो अपनी फिल्मों के सारे स्क्रीन प्ले खुद लिखते थे। वो खुद की फिल्म का सेट और कॉस्ट्यूम डिजाइन करते थे, 1961 के बाद से उन्होंने अपनी हर फिल्म में संगीत भी खुद दिया, 1964 में आई चारुलता के बाद से वो कैमरा भी खुद संभालने लगे थे। इतना ही नहीं अपनी नई फिल्मों के लिए पोस्टर तक वो खुद डिजाइन किया करते थे। रे कंपोजर थे, राइटर थे, ग्राफिक डिजाइनर थे। अब कहां मिलते हैं ऐसे महामानव। कहा ये भी जाता है कि सत्यजीत रे ने अपना सिनेमाई सफर ऐसे एक्टर्स और टेक्नीशियंस के साथ शुरू किया था जिनमें से ज्यादातर फिल्मों में नए थे। 37 साल और 36 फिल्मों के अपने पूरे करियर में उनके क्रू में कोई खास बदलाव नहीं आया। उनकी हर फिल्म एक ही एडिटर रहे- दुलाल दत्त, उन्होंने अपनी सारी फिल्में सिर्फ 3 सिनेमैटोग्राफर और 2 आर्ट डायरेक्टर्स के साथ बनाईं। 

सत्यजीत रे की निजी जिंदगी भी बॉलीवुड फिल्म से कम नहीं रही। सत्यजीत रे की पत्नी बिजोया ने अपनी किताब ‘माणिक एंड आई’ में इन अनुभवों को शेयर किया है। 1992 में सत्यजीत रे के निधन तक लिखी गई उनकी निजी डायरी पर आधारित इस किताब को पेंग्विन इंडिया ने प्रकाशित किया है। इस किताब में इस बात का ज़िक्र किया गया है कैसे दोनों 8 साल तक डेटिंग करते रहे और फिर चुपचाप शादी कर ली। इसके बाद एक योजना बनाकर दोनों परिवारों को राजी किया। उन्होंने बताया कि वह और माणिक बचपन से ही दोस्त थे, लेकिन 1940 के आसपास वह दोनों एक दूसरे के ज्यादा करीब आए। मिली जानकारी के मुताबिक हिंदी फिल्म जगत के ‘शोमैन’ राज कपूर फिल्मकार सत्यजीत रे की कालजयी फिल्म ‘पथेर पांचाली’ से इतने प्रभावित हुए थे कि उन्हें मुंबई ले जाने को उतावले हो गए थे। सत्यजीत रे को मनाने राज कपूर खुद अभिनेत्री नरगिस के साथ उनके घर पहुंच गए थे और खाली चेक देकर मुंहमांगी रकम भरने की पेशकश कर डाली थी, लेकिन सत्यजीत रे मुंबई जाने को तैयार नहीं हुए।

 कहा जाता है कि सत्यजीत रे का प्राण बांग्ला फिल्मों में ही बसता था और इस वजह से ही वो कलकत्ता छोड़कर मुंबई नहीं जाना चाहते थे। लेकिन बांग्ला फिल्म इंडस्ट्री की हालत ठीक नहीं थी। इसलिए उन्होंने इतना बड़ा ऑफर ठुकरा दिया था। सत्यजीत को पहली फिल्मों के लिए ही 11 अन्तरराष्ट्रीय पुरस्कारों से नवाजा गया। भारत सरकार के द्वारा 32 राष्ट्रीय पुरस्कारों से सम्मानित किया गया था। भारतीय सिनेमा को अंतरराष्ट्रीय स्तर तक पहुंचाने का श्रेय सत्यजीत रे को ही जाता है। फिल्मी जगत के सबसे बेहतरीन निर्देशकों में शुमार रे को 1992 में लाइफटाइम अचीवमेंट की श्रेणी में ऑस्कर से सम्मानित किया गया था।सत्यजीत के पास वो अवार्ड खुल चलकर कलकत्ता आया था क्योंकि वो काफी बीमार थे। इन फिल्मों को भी कई पुरस्कार मिले। सत्यजीर रे ने अपने करियर में पाथेर पांचाली, ‘अपराजितो’ (1956) और ‘अपूर संसार’ (1959), ‘देवी’, ‘महापुरुष’, ‘चारुलता’, ‘तीन कन्या’, ‘अभियान’, ‘कापुरुष’ (कायर) और ‘जलसाघर’ जैसी करीब 37 फिल्मों को डायरेक्ट किया। इसमें फीचर फिल्मों के अलावा, डॉक्यूमेंट्री और शॉर्ट फिल्में भी शामिल हैं।

1991 में उत्पल दत्त के अभिनय से सजी आगंतुक सत्जीत रे की आखिरी फिल्म रही। 1992 में इस महान फिल्मकार की जिंदगी के चलचित्र का पटाक्षेप हो गया। सत्यजीत रे की कालजयी फिल्में हमेशा सिनेमा प्रेमियों और सिनेमा के प्रशिक्षुओं के लिए अनमोल धरोहर रहेंगी और आने वाली सदियों को बहुत कुछ सिखाती रहेंगी।