SPECIAL STORY: ‘‘हम मजदूरों का कोई जीवन नहीं है। हम मजदूरों का कोई देश नहीं।’’

38 साल का ये प्रवासी कामगार बिलख इसलिए रहा था कि उसके 1 साल के बेटे की मौत हो गई लेकिन आखिरी वक्त में वो अपने मासूम बच्चे का चेहरा भी नहीं देख पाया।

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“हम मजदूरों का कोई जीवन नहीं है”…ये शब्द उस कामगार रामपुकार पंडित की है जिसकी तस्वीर इन दिनों सोशल मीडिया, टीवी और अख़बारों में काफी वायरल हो रहा है। ये वही कामगार है जो दिल्ली के निजामुद्दीन पुल के नीचे बैठा अपने किसी परिजन से बात कर रहा था और फूट-फूट कर रो रहा था। ये तस्वीर आज प्रवासी मजदूरों का चेहरा बन गया है। कोराना वायरस संक्रमण के बाद देश में लॉकडाउन हुआ तो उससे प्रवासी मजदूरों के सामने उनके अस्तित्व पर ख़तरा मंडराने लगा और ऐसे में रामपुकार भी अपनी अस्तित्व की लड़ाई में बिल्कुल अकेला हो गया। 38 साल का ये प्रवासी कामगार बिलख इसलिए रहा था कि उसके 1 साल के बेटे की मौत हो गई लेकिन आखिरी वक्त में वो अपने मासूम बच्चे का चेहरा भी नहीं देख पाया। उसकी ये तस्वीर सुर्खियों में भी बहुत आई लेकिन वो सुर्खिया उसे अपने बच्चे तक नहीं पहुंचा पाया और एक साल के बेटे की मौत से पहले उसकी सूरत तक न देख पाने के दुख ने उसे तोड़कर रख दिया है।

हमारे एक पत्रकार भाई ने दिल्ली के एक सिनेमाहॉल में काम करने वाले रामपुकार की राह चलते ऐसी हालत देखी और अपनी गाड़ी को रोक उसकी तस्वीर निकाली और उसके पास आया और उससे उसका हाल चाल जानना चाहा तब पता चला कि दिल्ली से करीब 1,200 किलोमीटर दूर बेगुसराय में अपने गांव जाना चाहता है। वो अपने बच्चे से मिलना चाहता है जिसकी मौत हो चुकी है। लेकिन जो सरकार विदेश में फंसे लोगों को लाने के लिए विमान पर विमान विदेशों में भेज रहे हैं, वही सरकार अपने ही देश में फंसे लोगों के लिए कुछ नहीं कर पा रही। रामपुकार की तस्वीर जब वायरल हुई तब जाकर उसे किसी आम आदमी ने मदद की और फिर वो अपने गांव पहुंच पाया। फिलहाल रामपुकार बेगुसराय के बाहर एक गांव के स्कूल में पृथक-वास केंद्र में रह रहा है। लेकिन उसका दुख बस इसलिए कम नहीं हो पा रहा है कि वो आखिरी वक्त में अपने बच्चे को देख नहीं पाया। जिस वक्त ये तस्वीर ली गई उसके कुछ देर के बाद ही उसके 1 साल के मासूम बेटे की मौत हो गई। एक अखबार एजेंसी ने रामपुकार को फोन किया तो उसने कहा, ‘‘साहब हम मजदूरों का कोई जीवन नहीं है।’’

रामपुकार ने कहा, ‘‘मेरा बेटा जो एक साल का भी नहीं हुआ था, उसकी मौत हो गई और मेरे सीने पर मानो कोई पहाड़ गिर गया। मैंने पुलिसवालों से मुझे घर जाने देने की गुहार लगाई लेकिन किसी ने मेरी कोई मदद नहीं की।’’ साथ ही रामपुकार ने कहा, ‘‘एक पुलिसकर्मी ने तो यह तक कह दिया, ‘क्या तुम्हारे घर लौटने से, तुम्हारा बेटा जिंदा हो जाएगा क्या? लॉकडाउन लागू है, तुम नहीं जा सकते’। मुझे उनसे यह जवाब मिला।’’ आपको यहां ये बता दें कि यहां उसकी मदद किसी और ने नहीं बल्कि एक आम महिला और एक पत्रकार ने की। रामपुकार बताता है कि वो ना तो उस महिला को जानता है और ना ही उस पत्रकार को।

रामपुकार ने कहा, ‘‘मैं थका-हारा सड़क किनारे बैठा था और यह सोच रहा था कि मैं घर कैसे पहुंच सकता हूं। एक पत्रकार आया और उसने मुझसे पूछा कि मैं परेशान क्यों हूं। उसने मुझे अपनी कार से ले जाकर मदद करने की कोशिश की, लेकिन पुलिस ने उसे अनुमति नहीं दी। इसके बाद एक महिला आई और उसने कुछ इंतजाम किया… वह मेरे माई-बाप की तरह थी।’’ रामपुकार मदद पहुंचने से पहले 3 दिन तक निजामुद्दीन पुल पर ही भूखा प्यासा फंसा हुआ था। रामपुकार ने कहा, “महिला ने मुझे खाना और 5,500 रुपए दिए। उसने विशेष ट्रेन में मेरा टिकट बुक कराया और इस तरह मैं बिहार पहुंचा।’’

रामपुकार को आज सरकार पर गुस्सा आ रहा है। अब वो भी यही समझने लगा है कि सरकार बस अमीरों की मदद करती है गरीबों की नहीं। उसने कहा, ‘‘अमीर लोगों को हर तरह की मदद मिलेगी। उन्हें विदेश से विमानों से घर लाया जा रहा है, लेकिन गरीब प्रवासी मजदूरों को उनके हाल पर छोड़ दिया गया है। हमारी जिंदगी की यही कीमत है। हम मजदूरों का कोई देश नहीं।’’ आज ये कामगार अपने ही देश में आहत हो गया। अपनी सरकार पर से ही भरोसा उठ गया। और उठे भी क्यों ना। जिस वक्त उसे सही मायने में सरकार औऱ प्रशासन की जरुरत थी उस वक्त उसकी मदद किसी ने नहीं की, यहां तक की पुलिस वाले ने भी खरी खोटी सुनाई। लेकिन भारत वसुधैव कुटुंबकम की परिभाषा को लेकर चलता है और आज भी ऐसे लोग हैं जो मुश्किल की इस घड़ी में एक दुसरे का साथ दे रहे हैं। मीडिया अपना रोल अदा कर रही है। आज अपनी ड्यूटी करते हुए हर पत्रकार चाहे जैसे हो वो लोगों की मदद कर रहा है। सरकार राहत की घोषणा करती है और वो रकम शायद आज भी एक गरीब के पास नहीं पहुंच रहा। क्योंकि या तो गरीब को पता नहीं होता या फिर सरकार अफसर उसे अपने खाते में पहुंचा देते हैं।

रामपुकार अबतक अपने परिवार से नहीं मिल पाया है और ऐसे में ये दर्द उसे अंदर ही अंदर खा रही है। तीन बेटियों के पिता रामपुकार ने अपने बेटे का नाम रामप्रवेश रखा था, क्योंकि उसके नाम में भी राम शब्द है। उसने कहा, ‘‘क्या एक बाप घर जाकर अपने परिवार से मिलकर अपने बेटे की मौत का दु:ख नहीं बांटना चाहेगा?’’ उसने कहा, ‘‘मैं दिल्ली से एक विशेष ट्रेन से कुछ दिन पहले बेगुसराय पहुंचा हूं। हमें पास में एक जांच केंद्र ले जाया गया और वहां रात भर रखा गया। एक बस हमें सुबह बेगुसराय के बाहर एक स्कूल में ले गई और मैं तभी से यहां हूं।’’ रामपुकार ने कहा, ‘‘मेरी पत्नी बीमार है और मेरी तीन बेटियां पूनम (9 साल), पूजा (4 साल) और प्रीति (2 साल) मेरा इंतजार कर रही हैं। ऐसा लगता है कि यह इंतजार कभी खत्म ही नहीं होगा।’’

न्यूज नेक्सट की तरफ से मैं इतना कहना चाहता हूं कि मैं नहीं जानता कि वो महिला कौन है जिसने रामपुकार की मदद की या वो पत्रकार कौन ही जिसने ये तस्वीर निकाली और फिर इसे सोशल मीडिया पर वायरल किया और इसका सबसे बड़ा फायदा ये हुआ कि आज वो अपने गांव में है। हम उस महिला और अपने उस पत्रकार भाई को धन्यवाद देना चाहते हैं जिनके प्रयास से रामपुकार आज अपने घर पहुंचा और आप सभी से भी अपील करना चाहते हैं कि अगर आप भी अपने आसपास किसी बेबस मजदूर या अपने घर के स्टाफ को देखते हैं तो उसी मदद करें। अपके घर का स्टाफ जो लॉकडाउन की वजह से आपके यहां काम करने नहीं आ पा रहा है उसका वेतन ना काटें। क्योंकि आपके वेतन से उसका परिवार चलता है।